गाँव की सुबह और ज़िंदगी की उलझनें
A reflection on the invisible weight of being human.
सुबह की शांति अक्सर मन के शोर को और तेज़ कर देती है। जब सूरज की पहली किरणें गाँव के खेतों को छू रही हैं, एक गहरी और व्यक्तिगत बातचीत शुरू होती है। यह सिर्फ एक व्लॉग नहीं है; यह एक इंसान के दिल का हाल है जो ज़िंदगी की भागदौड़ में कहीं थम सा गया है।
हम सभी के जीवन में वह दौर आता है जिसे हम “जीवन में अर्चन” (Obstacles) कहते हैं। यह वो अदृश्य दीवारें हैं जो हमें आगे बढ़ने से रोकती हैं—कभी असफलता का डर, कभी जिम्मेदारियों का बोझ, और कभी अपने ही मन की उलझनें।
वीडियो का शीर्षक, “हम इंसान भी ना…”, एक गहरी सांस जैसा है। यह उस विडंबना को दर्शाता है कि हम बाहर से कितने मज़बूत दिखने की कोशिश करते हैं, लेकिन अंदर से कितने नाज़ुक होते हैं।
“दिलों का बोझ हल्का करने के लिए, कभी-कभी बस खुद से सच बोलना ज़रूरी होता है।”
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